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संस्तुति

‘प्रत्येक बच्चा महत्वपूर्ण होता है और सीखने की काबलियत रखता है। शर्त यह है की सिखाने वालेको तीन बातों (विषयवस्तु, शिक्षणशास्त्र एवं शिक्षार्थी) का उपयुक्त ज्ञान होना चाहिए। जब शिक्षक बच्चों को किसी विषय में कमजोर घोषित करता है, नालायक या ठस दिमाग होने का ठप्पा लगाता है और अभिभावकों से शिकायत करता है तो अभिभावकों को यह समझ लेना चाहिए कि वह अपनी असफलता को छिपाने की कोशिश में लगा है।’

उमंग टीम का अनुभव


”कल्पना कीजिए ऐसी जगह की जहां को यूनिफॉर्म या होमवर्क का डर नहीं सताता बल्कि वे यह सोचते हुए आते हैं कि आज हमें ये गीत गाना है, खेल खेलना है, कुछ नया करना है।

यदि हर बच्चे को सुरक्षा और आत्मीय प्रेम का वातावरण प्रदान किया जाए तथा सिखाने के तौर-तरीकों को बदला जाए, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह ना सीखे। उमंग में हर बच्चा अपने आप में अलग होता है।”


‘भारत में हम जिस प्रकार की स्थिति देखते हैं, उसमें यह शिक्षा-प्रणाली की जिम्मेदारी है कि वह विभिन्न सामाजिक वर्गों और समूहों को निकट लाने और इस प्रकार एक समतापूर्ण तथा एकीकृत समाज के आविर्भाव में सहायक हो। किन्तु वर्तमान में, ऐसा करने के स्थान पर, स्वयं शिक्षा ही सामाजिक अलगाव को बढ़ाने तथा वर्गगत भेदभाव को बनाए रखने एवं उन्हें और भी बढ़ाने की ओर प्रवृत्त हो रही है।’

कोठारी आयोग, 1962


‘बच्चे उसी वातावरण में सीख सकते हैं जहां उन्हें लगे कि उन्हें महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हमारे स्कूल आज भी सभी बच्चों को ऐसा महसूस नहीं करवा पाते। सीखने का आनंद व संतोष के साथ रिश्ता होने के बजाए भय, अनुशासन व तनाव से संबंध हो तो यह सीखने के लिए अहितकरी होता है आज यह आवश्यक है कि हमारे सभी बच्चे यह महसूस करें कि वे सभी, उनका घर, उनका समुदाय, उनकी भाषा और संस्कृति महत्वपूर्ण हैं।’

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005


‘सीखने की एक उचित गति होनी चाहिए ताकि विद्यार्थी अवधारणाओं को रट कर और परीक्षा के बाद सीखे हुए को भूल न जाएं बल्कि उसे समझ सकें और आत्मसात कर सकें। साथ ही, सीखने में विविधता व चुनौतियां होनी चाहिए ताकि वह बच्चों को रोचक लगे और उन्हें व्यस्त रख सके। उब महसूस होना इस बात का संकेत है कि वह कार्य बच्चा अब यांत्रिक रूप से दोहरा रहा है और उसका संज्ञानात्मक मूल्य खत्म हो गया है।’

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005


‘लोकतंत्र प्रत्येक व्यक्ति के मनुष्य के रूप में सम्मान व योग्यता में आस्था पर आधारित होता है … अत: लोकतांत्रिक शिक्षा का उद्देश्य है व्यक्तित्व का पूर्ण व चहुमुखी विकास अर्थात् एक ऐसी शिक्षा जो विद्यार्थियों को एक समुदाय में जीने की बहुआयामी कला में दीक्षित करे। बहरहाल, यह स्पष्ट है कि एक व्यक्ति न तो अकेले रह सकता है और न ही विकसित हो सकता है … उस शिक्षा को कोई लाभ नहीं जो अपने साथी नागरिकों के साथ शालीनता, सामंजस्य, कार्यकुशलता के साथ जीने की शैली के लिये आवश्यक गुणों को पोषित न करती हो।’

माध्यमिक शिक्षा आयोग, 1952


‘किसी चीज पर इसलिए विश्वास मत करो, कि तुम्हें वैसा बताया गया है या कि परम्परा से वैसा होता आया है अथवा स्वयं तुमने उसकी कल्पना की है। तुम्हारा शिक्षक जो कहता है उस पर महज इसलिए विश्वास मत करो कि तुम उसका आदर करते हो। किन्तु उचित परीक्षण और विश्लेषण के बाद तुम्हें जो कल्याणकारी लगे, सर्वहितकारी लगे – उसी सिद्धान्त पर विश्वास करो। उस पर अडिग रहो और उसे अपना मार्गदर्शक मानो।’

गौतम बुद्ध


”आज विद्यार्थी के रूप में मेरे बच्चे भी उन्हीं पाठों का अध्ययन कर रहे हैं जो बीस साल पहले विद्यार्थी के रूप में मैंने पढ़े थे। सारे-संसार में नई-नई पद्यतियां आजमाई जा रही हैं लेकिन हमारे विद्यार्थी श्यामपट्ट पर लिखे अभ्यासों की नकल करते हैं, उन्हें याद करते हैं और परीक्षा में उगल देते हैं।”

साभार: एनसीएफ 2005


”मुक्त व्यवस्था से हमें डर केवल इसलिए लगता है कि हम बिल्कुल भिन्न व्यवस्था के, जिसमें हमने खुद शिक्षा पाई है, आदि हैं। बहुत सारे मामलों में बलप्रयोग सिर्फ जल्दबाजी के कारण, मनुष्य के स्वभाव का पर्याप्त सम्मान न किए जाने के कारण किया जाता है। हमें लगता है कि बलप्रयोग ही एकमात्र उपाय है।”

लेव तोलस्तोय


आगामी कार्यकर्म

सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन

Date: फ़रवरी 4, 2018

Time: 3:00pm-5:00pm

Location: गन्नौर

सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन

04 फरवरी 2018 में उमंग पाठशाला सांस्कृतिक आयोजन करने जा रहा है। आयोजन का समय दोपहर बाद 3 से 5 बजे तक रहेगा। आयोजन में कुछ प्रदर्शिनों का आयोजन होगा ।

कुछ टिप्पणियां

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