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 बच्चों. को सुनाने (मौखिक) के लिये कहानियां

 

 

 

चींटी और हाथी

 

एक चींटी थी। वह रोज सुबह उठती। भोजन की तलाश में जंगल जाती। सभी चींटियां उसके साथ जाती।
इसी जंगल में एक हाथी रहता था। उसका रंग सफेद था। वह दिन भर घूमता रहता। कभी इस पेड़ को तोड़ता। कभी उस पेड़ को तोड़ता। कुछ खाता, कुछ फेंक देता। लंबी सूंड में पानी भरता और नहाता। दूसरे जानवरों को पानी से भिगोता। जानवरों से धक्का-मुक्की कर देता। चींटियों को मसल देता। सभी उससे डरते थे। कोई कुछ न कहता। हाथी से सभी तंग थे। यहाँ तक कि दूसरे हाथी भी।
एक दिन की बात है। चींटी हाथी से मिली। हाथी के कारनामे उसे नहीं भाये। वह बोली- ‘‘तुम दूसरों को सताते हो। यह ठीक नहीं है।’’
हाथी बोला- ‘‘चुप रह। छोटी सी जान, बिता भर जुबान। मेरी मर्जी, मैं चाहे जो करूं। तुझे क्याॽतू जानती है मैं कौन हूँॽ’’
चींटी बोली- ‘‘जानती हूँ। तुम गुण्डा हो। जंगल के दादा हो।’’
हाथी सूंड उठाकर बोला- ‘‘तो क्याॽ फिर क्यों ऐंठती हैॽ ज्यादा बोलेगी, कुचल दूँगा।’’
चींटी बोली- ‘‘तेरी दादागिरी नहीं चलेगी। शेरजी से कह दूँगी।’’
हाथी हंसकर बोला- ‘‘शेर से क्या कहेगीॽ वह मेरे दम पर मुखिया है।’’
चींटी चुप हो गई। वह घास में जाकर छिप गई। हाथी इधर-उधर घुम रहा था। चींटी चुपके से हाथी की सूंड में घुस गई। हाथी अपनी मौज में था। चींटी सूंड के अन्दर घुसती ही गई।अब चींटी ने हाथी को काटना शुरू किया। हाथी परेशान होने लगा। उसने जोर-जोर से सूंड पटकी। फूँक लगाई। कोई जुगत काम न आई। चींटी ने काटना बंद नहीं किया। हाथी चीख पड़ा।
तब चींटी बोली- ‘‘आया मजा बच्चू। अब क्यों रोते होॽ आई नानी याद।’’
चींटी हाथी को काटती रही। हाथी गिर पड़ा। बोला- ‘‘चींटी रानी। माफ करो, माफ करो। अब किसी को नहीं सताऊँगा। किसी को छोटा न मानूंगा।’’
चींटी ने सोचा, हाथी को अब आई अकल। चींटी सूंड से बाहर निकल आई। बोली- ‘‘हाथी दादा। जमाना बदल गया है।हाथी ने सूंड उठाकर हामी भरी।’’

किसान और भालू

 

एक किसान आलू बोने के लिए जंगल गया। वह हल चला ही रहा था कि वहां एक भालू आ गया। भालू ने कहा, किसान, मैं तेरी हड्डी-पसली तोड़ डालूँगा।
नहीं ऐसा नहीं करो, प्यारे भालू। इसकी बजाय, हम मिलकर आलू बोएँ। मैं उसकी जड़ें ले लूँगाऔर तुम्हें पत्ते दे दूँगा। भालू बोला, ठीक है। अगर धोखा दोगे, तो फिर कभी भूलकर भी जंगल में पैर नहीं रखना।
कुछ समय बाद खूब बड़े-बड़े आलू पैदा हुए। पतझड़ में किसान उन्हें निकालने के लिए आया। उसी वक्त भालू भी जंगल से निकलकर सामने आ गया और बोला, किसान, आओ, आलू कि फसल बाँट लें। मेरा हिस्सा मुझे दे दो।
अच्छी बात है, बाँट लेते हैं, प्यारे भालू। ये रहे तुम्हारे पत्ते और ये रही मेरी जड़ें। किसान ने भालू को सारे पत्ते दे दिए और आलुओं को घोड़ा-गाड़ी में लादकर बेचने चल दिया। रास्ते में भालू फिर मिला। किसान तुम कहाँ जा रहे हो, भालू ने पूछा।
प्यारे भालू, मैं जड़ें बेचने शहर जा रहा हूँ, किसान ने जवाब दिया। एक जड़ तो दो, मैं चखकर देखूँ, भालू बोला।
किसान ने उसे एक आलू दिया। भालू ने उसे खाया और गुस्से से गरजते हुए बोला, अरे किसान, धोखा दिया है तुमने मुझे। अब तुम लकड़ी काटने के लिए जंगल में नहीं आना, नहीं तो हड्डी-पसली तोड़ दूँगा।
अगले साल किसान ने उसी जंगल में गेहूँ बोया। वह फसल काटने आया, तो भालू को वहाँ खड़ा पाया। अब तू मुझे धोखा नहीं दे पाएगा, किसान। दे मेरा हिस्सा, भालू बोला। किसान बोला, ऐसा ही सही। प्यारे भालू, तुम ले लो जड़ें और मैं पत्ते ले लेता हूँ।
दोनों ने फसल बटोरी। किसान ने भालू को जड़ें दे दीं और गेहूँ को घोड़ा-गाड़ी में लादकर घर ले गया। भालू जड़ों को चबाता रहा, मगर चबा न पाया। वह किसान से बेहद नाराज हो गया।
तभी से भालू और किसान के बीच दुश्मनी चली आ रही है।

नन्हा पेड़

एक जंगल में एक छोटा-सा पेड़ था। वह आँधी में हिलता, धूप में जलता और बारिश में भीगता रहता। जंगल में और भी पेड़ थे लेकिन नन्हा पेड़ सबसे अलग था। दूसरे पेड़ों पर तो हरे-भरे पत्ते थे लेकिन इस पेड़ पर सिर्फ काँटे थे।
छोटे पेड़ को यह बहुत बुरा लगता। वह सोचता सभी मुझसे डरते हैं। काँटों के डर से कोई मुझे छूता तक नहीं। कितना अच्छा होता अगर मेरे ऊपर सुनहरे पत्ते होते, बिल्कुल सोने की तरह चमकीले।
अगले दिन जब सूरज निकला तो एक अजीब-सी चीज दिखी। उस पेड़ के सारे काँटे गायब हो गए और ढेर सारे सुनहरे पत्ते उग आए। सूरज की रोशनी में वो चमचमा रहे थे। पेड़ बहुत खुश हो गया।
धीरे-धीरे शाम हो गई और फिर रात घिर आई। उस समय वहाँ पर एक कंजूस बूढ़ा आया। उसने देखा, इस नन्हेर पेड़ पर तो सोने के पत्ते लगे हैं। चुपके-चुपके उसने सारे पत्ते तोड़कर थैली में भर लिए।
पेड़ बेचारा फिर से ठूँठ बन गया। उसे बहुत दुःख हुआ। सोचने लगा, मेरे पत्ते जरूर हों लेकिन सुनहरे नहीं। काँच जैसे चमकदार होने से ही काम चल जाएगा।
सुबह हुई तो पेड़ पर सुन्दर-सुन्दर, रंग-बिरंगे काँच के पत्ते लगे हुए थे। पेड़ बहुत खुश हुआ। कहने लगा, देखे हैं ऐसे पत्ते किसी और पेड़ पर। उसी वक्त काले बादल छा गए और धीर-धीरे सूरज बादलों के पीछे छिप गया। तभी न जाने कहाँ से तेज आँधी आई और पूरा जंगल हिलने लगा। बड़े-बड़े पेड़ तक जोर-जोर से हिलने लगे। इसी तेज हवा में छोटे पेड़ के काँच के पत्ते झड़-झड़कर चकनाचूर हो गए।
पेड़ फिर से ठूँठ हो गया। कहने लगा, अब मुझे न सोने पत्ते चाहिए न काँच के। दूसरे पेड़ों की तरह के हरे पत्ते ही काफी होंगे मेरे लिए।
अगले दिन सुबह उठते ही उसने देखा कि उसकी डालों पर हरे-भरे पत्ते हैं। अब मैं सचमुच बहुत खुश हूँ, छोटे पेड़ ने सोचा।
इतने में वहाँ से गुजरते एक बकरे ने इस छोटे-से पेड़ के हरे-भरे पत्ते देखे। वह आकर उन्हें झटपट खान लगा। छोटा पेड़ चुपचाप देखता रहा। करता भी तो क्या। बकरे ने सब पत्ते खा लिए।
वह फिर से ठूँठ बन गया। दुःखी होकर उसने कहा, ध-त्तेरे-की। नहीं चाहिए मुझे पत्ते – न काँच के, न सोने के, न हरे। इन पत्तों से तो मेरे पुराने काँटे ही अच्छे थे।

 

अक्लमन्द बकरी

 

एक बार पहाड़ की गुफा में जंगली बकरियों का एक झुण्ड रहता था। उस गुफा के नीचे एक दूसरी गुफा में सियारों का एक जोड़ा रहता था। जब भी कोई बकरी झुण्ड से अलग होती तो सियार उसे मारकर खा जाते। झुण्ड की सरदार बकरी ने देखा कि बकरियाँ कम होती जा रही हैं। उसने सोचा – जरूर दुष्ट सियार उन्हें मारकर खा रहे होंगे। मैं अपनी बकरियों का सावधान रहने के लिए कहूँगी।

उसने बकरियों को बुलाकर कहा, अकेले बाहर मत जाया करो नहीं तो वे चालाक सियार तुम्हें खा जाएँगे। तुम लोग झुण्ड में बाहर निकला करो।

बकरियों ने अपनी सरदार की चेतावनी पर खूब ध्यान दिया। वे सदा झुण्ड में घूमने लगीं। इससे सियार अब उनमें से किसी को भी मार नहीं पा रहे थे। नर सियार समझ गया कि बकरियाँ अपनी सरदार के कारण ही इतनी सावधान और चौकस रहती हैं। वह अपनी पत्नी से बोला, जब तक यह सरदार बकरी है हम किसी बकरी को मारकर खा नहीं सकते। हमें किसी तरह से उसे ही मार डालना चाहिए। मेरे पास एक तकरीब है मगर उसमें तुम्‍हें मेरी सहायता करनी चाहिए।

मादा सियार ने पूछा, मैं तुम्हारी क्या मदद करूँ?

तुम बकरी सरदार से दोस्ती कर लो। फिर उससे कहो कि मैं मर गया हूँ और मुझे मिट्टी में दबाने के लिए तुम्हें उसकी मदद चाहिए। फिर तुम उसे यहाँ ले आना। जैसा ही वह गुफा में घुसेगी मैं उस पर झपट पडूँगा और उसे मार डालूंगा।

मादा सियार इन सब बातों सहमत हो गई। पहाड़ की ढलान पर जाकर उसने सरदार बकरी से दोस्ती कर ली। कुछ दिन बाद मादा सियार ने बकरी से कहा, एक बुरी खबर है। पिछली रात नर सियार की अचानक मृत्यु हो गई। मुझे बहुत अकेलापन महसूस हो रहा है। ऐसा कोई भी नहीं है जो मेरी मदद करे। केवल तुम ही मेरी सखी हो। क्या तुम उसका शरीर मिट्टी में दबाने में मेरी सहायता करोगी।

बकरी ने कहा, सखी, मुझे तुम्हारे सियार से अब भी डर लगता है। मैं तुम्हारी गुफा में नहीं जा सकती।

डरो मत, मादा सियार बोली, मरा हुआ सियार तुम्हारा क्या बिगाड़ सकता है। कृपाकरके मेरी मदद करो।

बहुत कहने पर बकरी मादा सियार के साथ जाने के लिए तैयार हो गई। लेकिन उसे शक था, इसलिए उसने सोचा कि वह पूरी सावधानी बरतेगी। उसने गुफा का रास्ता दिखाने के लिए मादा सियार से आगे-आगे चलने को कहा। मरने का बहाना कर लेटे हुए नर सियार ने जब पैरों की आहट सुनी तो वह अधीर हो उठा। उसने जरा-सा सिर उठाया और एक आँख से देखा।

बकरी पहले से ही चौकस थी। उसने सब देख लिया। वह मुड़ी और वहाँ से भाग गई। मादा सियार उसके पीछे-पीछे भागी और उसे वापस आने के लिए कहने लगी। लेकिन बकरी ने सीधे घर पहुँच कर साँस ली।

मादा सियार वापस अपनी गुफा में आ गई। नर सियार ने उससे पूछा, अब क्या करें। बकरी को फिर से यहाँ कैसे लाएँ।

मैं उसे वापस लाने की कोई न कोई तरकीब निकाल लूंगी। यह कहकर मादा सियार फिर बकरी के पास पहुँची।

उसने बकरी से कहा, तुम्हारा हमारे घर आना तो वरदान साबित हुआ। मेरा सियार जीवित हो गया। हम बहुत खुश हैं चाहते हैं कि आज रात तुम हमारे साथ दावत खाओ।

बकरी को पता था कि इन सियारों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है। उसने सोचा कि इन दोनों को इतनी आसानी से नहीं छोड़ना चाहिए। इन्हें ऐसा पाठ पढ़ाना चाहिए जो इन्हे उम्र भर याद रहे।

उसने मादा सियार से कहा, मुझे यह सुनकर बड़ी खुशी हुई कि तुम्हारा सियार जीवित है। शाम को मैं जरूर दावत खाने आऊँगी और मेरा एक साथी भी मेरे साथ आएगा।

मादा सियार ने पूछा, तुम्हारे साथ कौन आएगा।

बकरी ने उत्तर दिया, एक शिकारी कुत्ता। यहाँ का सबसे बड़ा शिकारी कुत्ता। आज रात तुम हमारी राह जरूर देखना।

यह सुनकर मादा सियार बहुत डर गई। वह भागी-भागी अपनी गुफा में पहुँची और नर सियार से बोली, चलो यहाँ से तुरन्त भाग चलें। अपनी जान बचाने के लिए दोनों वहाँ से भाग गए और फिर कभी उस गुफा में नहीं आए।

 

देहाती चूहा, शहरी चूहा

एक छोटा-सा चूहा देहात में रहता था। उस बेचारे जीव के लिए जीना सरल न था। उसे भुट्टे, जौ, बीज के लिए काफी भाग-दौड़ करनी पड़ती थी। इन्हें वह अपने भण्डार में सर्दियों के लिए दबाकर रखता था। सर्दियों में उसे अपना बिल पेड़ के नीचे खोदना पड़ता था और पत्तों से अपने आपको ढकना पड़ता था। लेकिन उसके खाने के लिए पर्याप्त सामग्री थी और सोने के लिए आरामदेह खेत। वह इस वातावरण में बहुत खुश था।
एक दिन देहाती चूहे ने अपने भण्डार की तरफ देखा। वह पूरा भर गया था। उसने सोचा कि उसके पास खाने को पर्याप्त सामान है और मौसम भी अच्छा है। क्यों ना अपने चचेरे भाई, शहरी चूहे को बुलाकर कुछ समय अपने साथ रखा जाए। वह देहात में अपनी छुट्टियाँ अच्छी तरह से बिता सकेगा।
शहरी चूहा कुछ दिनों बाद आया। दोनों भाइयों के पास बात करने के लिए बहुत कुछ था। वे काफी समय से आपस में नहीं मिल पाए थे। लेकिन जब देहाती चूहे ने रात का भोजन परोसा तो शहरी चूहा उदास हो गया।
क्या तुम्हारे पास खाने के लिए सिर्फ दाने, जौ और सूखे फल ही हैं। मेरा ऐसी दावत खाने का बिल्कुल विचार नहीं था।
देहाती चूहा कुछ न बोला। रात को वे पेड़ के नीचे नरम घास पर सोए। दूसरे दिन सुबह शहरी चूहा कांपता हुआ उठा और बोला, यह तुम्हारा आराम करने का ढंग है। मैं जमने की हद तक ठण्डा हो गया हूँ। रात में ठीक से आँख तक नहीं झपकी।
देहाती चूहे ने कहा, मुझे खेद है।
लेकिन शहरी चूहे ने बात को उदारता से लिया और कहा, अफसोस मत करो भाई। आओ और मेरा शहर देखो। तुम देखोगे कि यहाँ और वहाँ में क्या अंतर है। हम अच्छा खाएँगे और पिएँगे। मेरे पास बड़ा आरामदेह बिल है जहाँ हम सोएँगे। मेरे साथ आओ और शहरी जीवन का मजा लो।
देहाती चूहा मान गया। दोनों चूहे शहर की तरफ चल पड़े। उन्हें घर पहुँचने में काफी रात हो गई थी। उस दिन उन्होंने बड़ा अच्छा भोजन किया। मेज अच्छी-अच्छी खाने वाली चीजों से भरी थी। मेज के चारों तरफ मखमल के गद्दे लगे हुए थे और सबकुछ आरामदायक था। शहरी चूहे ने उसे बैठने के लिए आमंत्रित किया और कहा, मैं तुम्हारे लिए खाने की बढ़िया वस्तुएँ लाता हूँ। उसने पनीर और रोटी का छोटा टुकड़ा, केक, अखरोट आदि देहाती चूहे को दिए। देहाती चूहे ने खाते हुए अपने भाई के शहरी जीवन को सराहा।
अभी दोनों चूहों ने कुछ ही टुकड़े खाए थे कि दरवाजा खुला और घर का मालिक अंदर घुस गया। दोनों चूहे नीचे कूद गए और डरकर मेज के नीचे छिप गए।
देहाती चूहा काँप रहा था। उसने किसी को कहते सुना, इस मेज पर कौन था।
फिर किसी ने दोवारा दरवाजा खोला और तीन चींघाड़ते और सूँघते हुए कुत्तों को अंदर घुसा दिया।
ओह, मेरे भगवान। देहाती चूहे ने शहरी चूहे के साथ कमरे के चारों तरफ भागकर जान बचाते हुए कहा। जहाँ कहीं भी वह छिपने की कोशिश करते वहां कुत्ते सूँघ लेते और उनकी तरफ बढ़ते। अन्त में चूहों को एक छोटा-सा छेद मिल गया जहाँ व आराम से घुसकर बचाव कर सकते थे। वे बैठे-बैठे घबरा रहे थे क्योंकि जब भी उन्होंने भागने लिए सिर बाहर निकाल कोई न कोई कुत्ता फिर भौंक जाता।
घण्टों बाद, जब कुत्ते और लोगों ने कमरे को छोड़ दिया तो देहाती चूहा सहमा, सूँघता बाहर आया। वह अब भी काँप रहा था। काफी देर छेद में रहने के कारण वह अकड़ गया था। हालाँकि वहाँ कोई नहीं था। देहाती चूहे ने कहा, मुझे डर लग रहा है और मैं वापस जा रहा हूँ। तुम्हारी आव-भगत का धन्यवाद। मैं महसूस करता हूँ कि अपनी फसलें, जौ, बीज और सर्दियों की ठण्डी हवाएँ तुम्हारे अच्छे खाने और आरामदायक घर से कहीं अच्छी है। आखिर मैं अपने देहात में शांति और आराम से सो तो सकता हूँ।

छींका-छींक

 

बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव में एक आदमी रहता था। उसकी बहुत बड़ी, मोटी और लम्बी-सी नाक थी। इसलिए लोग उसे बड़नक्कू कहा करते थे। बड़नक्कू को अपनी नाक इतनी पसन्द थी कि वह उसकी बड़ाई किया करता। जब भी वह किसी से मिलता तो वह हाथ मिलाने की जगह अपनी नाक आगे कर देता था।
एक दिन बड़नक्कू बाजार गया। पता है वहाँ उसे कौन मिला। छुटनक्कू। छुटनक्कू की नाक बिल्कुलछोटी-सी थी, जो उसको बहुत बुरी लगती थी। छुटनक्कू जब भी किसी से मिलता तो अपना चेहरा छिपाने की कोशिश करता ताकि कोई उसकी छोट-सी नाक देखकर उसका मजाक न उड़ाए।
जब छुटनक्कू बाजार में बड़नक्कू से मिला तो उसने सोचा – हर बार मुझे ही क्यों नाक छिपानी पड़ती है। इस बड़नक्कू को तो देखो कैसे नाक लिए फिरता है। छुटनक्कू को गुस्सा आ गया। उसकी जेब में बहुत सारी लाल मिर्च रखी थी। उसने मुट्ठीभर लाल मिर्च निकाली। जैसे ही बड़नक्कू ने अपनी नाक आगे की छुटनक्कू ने मिर्च भरे हाथ से उसकी नाक पकड़ ली। बड़नक्कू छींका और छींका और जमीन पर कुलाटी खाकर छींकता रहा। हर बार जब वह छींकता तो आस-पास के सब खिड़की-दरवाजे खड़खड़ाकर हिल जाते थे।
छुटनक्कू खूब हँसा। जमीन पर लोटकर, हाथ-पाँव उछाल-उछालकर हँसता रहा। इतना कि वह भूल ही गया कि उसके हाथों में अभी भी मिर्च लगी हुई थी। हँसते-हँसते उसने अपनी ही नाक पर मिर्च वाला हाथ रख दिया।
आक-छीं। आक-छीं। छुटनक्कू भी छींका, आ-छीं। आ-छीं। हर बार जब उसे छींक आती तो उसका पूरा शरीर हवा में उछल जाता और बम फूटने जैसी आवाज आती।
छुटनक्कू और बड़नक्कू एक दूसरे के सामने इतनी जोर से छींक रहे थे कि अचानक धड़ाम की आवाज आई। सबने देखा कि दोनों के सिर धड़ाम से टकरा गए थे। इतनी जोर से टकराए कि उनका छींकना ही रूक गया।
छुटनक्कू ने बड़नक्कू की तरफ देखा। बड़नक्कू ने छुटनक्कू की ओर देखा। वे एक-दूसरे को इतने मजेदार दिख रहे थे कि दोनों को हँसी आ गई। वे इतने झटके से हँसे कि फिर से उनकी छींक शुरू हो गई।
पर इस समय उऩ दोनों को इसकी कोई चिन्ता न थी और वे हँसते रहे और छींकते रहे, हँसते रहे और छींकते रहे।

सोनबाई और बगुला

 

एक थी सोनबाई। वह बड़ी सुन्दर थी। एक बार सोनबाई अपनी सहेलियों के साथ मिट्टी लेने गई। जहां सोनबाई खोदती, वहां सोना निकलता और जहां उसकी सहेलियां खोदती, वहां मिट्टी निकलती। यह देखकर सब सहेलियों के मन में सोनबाई के लिए ईर्ष्या पैदा हो गई। सब सहेलियों ने अपना-अपना टोकरा सिर पर उठाया और सोनबाई को अकेली ही छोड़कर चली गई।
सोनबाई ने अकेले-अकेले अपना टोकरा अपने सिर रखने की बहुत कोशिश की, पर वह टोकरे को किसी भी तरह चढ़ा नहीं पाई। इसी बीच उधर से एक बगुला निकला।
सोनबाई ने कहा, ‘‘बगुला भाई। बगुला भाई। यह टोकरा मेरे सिर पर रखवा दो।’’
बगुला बोला, ‘‘अगर तुम मुझसे ब्याह कर लो, तो मैं यह टोकरा सिर पर रखवा दूं।’’ सोनबाई ने हां कहा और बगुले ने टोकरा सिर पर रखवा दिया। टोकरा लेकर सोनबाई अपने घर की तरफ चली। बगुला उसके पीछे-पीछे चला। घर पहुँचकर सोनबाई ने अपनी मां से सारी बात कह दी।
मां ने कहा, ‘‘अब तुम घर के बाहर कहीं जाना ही मत। बाहर जाओगी, तो बगुला तुमको ले भागेगा।’’
बाहर खड़े हुए बगुले ने यह बात सुन ली। उसको बहुत गुस्सा आया। उसने सब बगुलों को बुला लिया और उनसे कहा, ‘‘इस नदी का सारा पानी पी डालो।’’ इतना सुनते ही सारे बगुले पानी पीने लगे और थोड़ी ही देर में नदी सूख गई।
दूसरे दिन जब सोनबाई का पिता अपनी भैसों को पानी पिलाने के लिए नदी पर पहुंचा, तो देखा कि नदी में तो कंकर-ही-कंकर रह गए हैं।उन्होंने नदी के किनारे खड़े हुए बगुले से कहाः

‘‘पानी छोड़ो बगुले भैया।
पानी छोड़ो बगुले भैया।
घुड़साल में घोड़े प्यासे हैं।
नोहरे में गायें प्यासी हैं।’’

बगुले ने कहा, ‘‘अपनी बेटी सोनबाई का ब्याह आप मुझसे कर देंगे, तो मैं पानी छोड़ दूंगा।’’
सोनबाई के पिता ने बगुले की बात मान ली, और बगुले ने नदी में पानी छोड़ दिया। नदी फिर पहले की तरह कल-कल, छल-छल करके बहने लगी।
सोनबाई का ब्याह बगुले के साथ हो गया। सोनबाई को अपने पंखों पर बैठाकर बगुला उसे अपने घर ले गया। फिर सोनबाई और बगुला एक साथ रहने लगे। बगुला स्वयं दाना चुग आता था और अपने साथ सोनबाई के लिए भी दाना ले आता था।ऐसा होते-होते एक दिन सोनबाई के एक लड़का हुआ। सोनबाई की खुशी का कोई ठिकाना न रहा।
एक दिन सोनबाई के पिता ने सोचा –‘किसी को भेजकर पता तो लगवाऊं कि सोनबाई सुखी है या दुखी है।’
पिता ने सोनबाई के भाई को भेजा। भाई सोनबाई के पास पहुँचा। भाई-बहन दोनों मिले और खूब खुश हुए। इतने में बगुले के चुगकर वापस आने का समय हो गया।
सोनबाई ने कहा, ‘‘भैया। तुम रजाइयों वाली इस कोठरी में छिप जाओ। बगुला ऐसा खूंखार है कि तुमको देख लेगा, तो मार डालेगा।’’
भाई कोठरी में छिप गया। सोनबाई ने दो पिल्ले पाल रखे थे। उनमें से एक को चक्की के नीचे छिपा दिया और दूसरे को झाड़ू से बांधकर घर में रखा। वह दरवाजे के पास जाकर उसकी आड़ में बैठ गयी। इसी बीच बगुला आया और बोला, ‘‘दरवाजा खोलो।’’ सोनबाई तो कुछ बोली नहीं, लेकिन सोनबाई का लड़का बोलाः
‘‘बाबा, बाबा।

मामा छिपे हैं कोठरी में।
छोटा पिल्ला बैठा है चक्की के नीचे।
बड़ा पिल्ला बंधा है झाड़ू से।’’
बाहर खड़ा बगुला बोला, ‘‘सोनबाई। यह मुन्ना क्या कह रहा है।’’
सोनबाई ने कहा, ‘‘यह तो योंही बड़-बड़ कर रहा है।’’
इतने में लड़का फिर बोला :
‘‘बाबा, बाबा।

मामा छिपे हैं कोठरी में।
छोटा पिल्ला बैठा है चक्की के नीचे।
बड़ा पिल्ला बंधा है झाड़ू से।’’

बगुला बोला, ‘‘दरवाजा खोलो।’’ लेकिन सोनबाई ने दरवाजा नहीं खोला। बगुला फिर चुगने चला गया।
बाद में मामा कोठरी से बाहर निकला और सोनबाई अपने लड़के को लेकर उसके साथ मायके चली गयी। जब बगुला घर लौटा, तो उसने देखा, वहां कोई नहीं है।

 

खींचातानी

 

एक था बनिया। नाम था, वीरचंद। गांव में रहता था। दुकान चलाता था और उससे अपना गुजर-बसर कर लेता था। गांव में काठियों और कोलियों के बीच झगड़े चलते रहते थे। पीढ़ियों पुराना बैर चला आ रहा था।
एक दिन काठियों के मन बिगड़े और कोलियों को ताव आ गया। बीच बाजार में तलवारें खींचकर लोग आमने-सामने खड़े हो गए। काठी ने अपनी खुखड़ी निकाल ली और कोली पर हमला किया। कोली पीछे हट गया और काठी पर झपटा। एक बार में काठई का सिर धड़ से अलग हो गया। तलवार खून से नहा ली।
मार-काट देखकर बनिया बुरी तरह डर गया और अपनी दुकान बंद करके घर के अन्दर दुबककर बैठ गया। बैठा-बैठा सब-कुछ देखता रहा और थर-थर कांपता रहा। लोग पुकार उठे- ‘‘दौड़ो-दौड़ो, काठी मारा गया है।’’ चारों तरफ से सिपाही दौड़े आए। गांव के मुखिया और चौधरी भी आ गए। सबने कहा, ‘‘यह तो रघू कोली का ही वार है।’’ दूसरे किसी की यह ताकत नहीं। लेकिन अदालत में जाना हो, तो बिना गवाह के काम कैसे चले।
किसी ने कहा, ‘‘वीरचंद सेठ दुकान में बैठे थे। ये ही हमारे गवाह है। देखा, या न देखा, ये जानें। पर अपनी दुकान में बैठे तो थे।’’
बनिया पकड़ा गया और उसे थानेदार के सामने हाजिर किया गया। थानेदार ने पूछा, ‘‘बोल बनिये। तू क्या जानता है।’’
बनिये ने कहा-‘‘हुजूर, मैं तो कुछ भी नहीं जानता। अपनी दुकान में बैठा मैं तो बही खाता लिखने में लगा था।’’
थानेदार बोला, ‘‘तुझे गवाही देनी पड़ेगी। कहना पड़ेगा कि मैंने सब-कुछ अपनी आंखों से देखा है।’’
बनिया परेशान हो गया। सिर हिलाकर घर पहुंचा। रात हो चुकी थी। पर नींद नहीं आ रही थी। बनिया सोचने लगा- ‘यह बात कहूंगा, तो कोलियों के साथ दुश्मनी हो जायेगी, और यह कहूंगा, तो काठी पीछे पड़ जायेंगे।’ कुछ अक्ल से काम लेना होगा। बनिये को एक बात सूझी और वह उठा। ढीली धोती, सिर पर पगड़ी और कंधे पर चादर डालकर वीरचंद चल पड़ा। एक काठी के घर पहुंचकर दरवाजा खटखटाया।
काठी ने पूछा, ‘‘सेठजी। क्या बात है। इतनी रात बीते कैसे आना हुआ।’’
बनिये ने कहा, ‘‘दादाजी। गांव के कोली पागल हो उठे हैं। कहा जाता है कि आज उन्होंने एक खून कर दिया। पता नहीं, कल क्या कर बैठेंगे।’’
बनिये की बात सुनकर दादाजी खुश हो गए और उन्होंने बनिये के हाथ में सौ रूपये रख दिए।
कमर में रूपए बांधकर बनिया कोली के घर पहुंचा। कोली ने पूछा, ‘‘सेठजी। इस समय कैसे आना हुआ। क्या काम आ गया।’’
बनिये ने कहा, ‘‘काम क्या बताऊं। अपने गांव के ये काठी बहुत बावले हो उठे हैं। एक को खत्म करके ठीक ही किया है। धन्य है कोली, और धन्य है, कोली की मां।’’
सुनकर कोली खुश हो गया। उसने बनिये को दस मन बाजरा तौल दिया। बनिया घर लौटा और रात आराम से सोया। सोते-सोते सोचने लगा- ‘आज कोली और काठी को तो लूट लिया, अब कल अदालत को भी ठगना है।’ दूसरे दिन मुकदमा शुरू हुआ।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘बनिये। बोल, जो झूठ बोले, उसे भगवान तौले।’’
बनिये ने कहा, ‘‘जो झूठ बोले, उसे भगवान तौले।’’
न्यायाधीश ने पूछा, ‘‘बनिये। बोल, खून कैसे हुआ और किसने किया।’’
बनिये ने कहा, ‘‘साहब, इधर से काठी झपटे और उधर से कोली कूदे।’’
‘‘फिर क्या हुआ।’’
‘‘फिर वही हुआ।’’
‘‘लेकिन वही क्या हुआ।’’
‘‘साहब। यही कि इधर से काठी झपटे और उधर से कोली कूदे।’’
‘‘लेकिन फिर क्या हुआ।’’
‘‘फिर तो आमने-सामने तलवारें खिंच गई और मेरी आंखें मिच गई।’’
इतना कहकर बनिया तो भरी अदालत के बीच धम्म से गिर पड़ा और बोला, साहब, ‘‘बनिये ने कभी खून की बूंद भी देखी है। जैसे ही तलवारें आमने-सामने खिंची, मुझे तो चक्कर आ गया और मेरी आंखें तभी खुली, जब सिपाही वहां आ पहुंचे।’’
न्यायाधीश ने कहा, सुन, एक बार फिर अपनी बातें दोहरा दे। बनिया बोलाः
‘‘इधर से काठी झपटे।
उधर से कोली कूदे।
आमने-सामने तलवारें खिंच गई।
और मेरी आंखें मिच गई।’’
न्यायाधीश ने बनिये को तो विदा कर दिया, लेकिन समझ नहीं पाए कि काठी का खून किसने किया है। मुकदमा खारिज हो गया।

चींटी और हाथी

 

एक चींटी थी। वह रोज सुबह उठती। भोजन की तलाश में जंगल जाती। सभी चींटियां उसके साथ जाती।
इसी जंगल में एक हाथी रहता था। उसका रंग सफेद था। वह दिन भर घूमता रहता। कभी इस पेड़ को तोड़ता। कभी उस पेड़ को तोड़ता। कुछ खाता, कुछ फेंक देता। लंबी सूंड में पानी भरता और नहाता। दूसरे जानवरों को पानी से भिगोता। जानवरों से धक्का-मुक्की कर देता। चींटियों को मसल देता। सभी उससे डरते थे। कोई कुछ न कहता। हाथी से सभी तंग थे। यहाँ तक कि दूसरे हाथी भी।
एक दिन की बात है। चींटी हाथी से मिली। हाथी के कारनामे उसे नहीं भाये। वह बोली- ‘‘तुम दूसरों को सताते हो। यह ठीक नहीं है।’’
हाथी बोला- ‘‘चुप रह। छोटी सी जान, बिता भर जुबान। मेरी मर्जी, मैं चाहे जो करूं। तुझे क्याॽतू जानती है मैं कौन हूँॽ’’
चींटी बोली- ‘‘जानती हूँ। तुम गुण्डा हो। जंगल के दादा हो।’’
हाथी सूंड उठाकर बोला- ‘‘तो क्याॽ फिर क्यों ऐंठती हैॽ ज्यादा बोलेगी, कुचल दूँगा।’’
चींटी बोली- ‘‘तेरी दादागिरी नहीं चलेगी। शेरजी से कह दूँगी।’’
हाथी हंसकर बोला- ‘‘शेर से क्या कहेगीॽ वह मेरे दम पर मुखिया है।’’
चींटी चुप हो गई। वह घास में जाकर छिप गई। हाथी इधर-उधर घुम रहा था। चींटी चुपके से हाथी की सूंड में घुस गई। हाथी अपनी मौज में था। चींटी सूंड के अन्दर घुसती ही गई।अब चींटी ने हाथी को काटना शुरू किया। हाथी परेशान होने लगा। उसने जोर-जोर से सूंड पटकी। फूँक लगाई। कोई जुगत काम न आई। चींटी ने काटना बंद नहीं किया। हाथी चीख पड़ा।
तब चींटी बोली- ‘‘आया मजा बच्चू। अब क्यों रोते होॽ आई नानी याद।’’
चींटी हाथी को काटती रही। हाथी गिर पड़ा। बोला- ‘‘चींटी रानी। माफ करो, माफ करो। अब किसी को नहीं सताऊँगा। किसी को छोटा न मानूंगा।’’
चींटी ने सोचा, हाथी को अब आई अकल। चींटी सूंड से बाहर निकल आई। बोली- ‘‘हाथी दादा। जमाना बदल गया है।हाथी ने सूंड उठाकर हामी भरी।’’

भेड़िए की दुम

 

जंगल में एक भेड़िया रहता था। बहुत दिनों से उसे शिकार नहीं मिला था। वह भूखा रह रहकर दुबला-पतला हो गया था। एक दिन शिकार की फिराक में गांव की तरफ आया। जब वह गांव के पास आया तो बड़े-बड़े शिकारी कुत्ते उसके पीछे पड़ गये। भेड़िया जान बचाकर भागा। कुत्ते भी उसके पीछे भागे। भेड़िये को एक गुफा दिखी। गुफा छोटी थी। भेड़िया उसमें घुस गया। कुत्ते बड़े थे। वे गुफा में न घुस सके। बाहर खड़े-खड़े भेड़िये का इन्तजार करने लगे।
उस भेड़िये का दम फूल रहा था। वह आराम करने लगा। जब उसकी सांस में सांस आई तो उसने अपने चारों ओर देखा। अपनी जान बच जाने पर वह खुश था। उसने अपने शरीर के एक-एक अंग को देखा। वह जानना चाहता था कि उसे बचाने में किस अंग ने कितनी मदद की है। सबसे पहले उसने पैरों से पूछा- ‘‘मेरे पैरों ! गुफा तक पहुँचने में तुमने मेरी क्या मदद कीॽ’’
‘‘हम ही तो तेजी से भाग कर तुम्हें यहां लाये हैं’’ -पैरों ने भेड़िए से कहा।
‘‘अच्छा, शाबाश ! तुम बहुत अच्छे हो’’- भेड़िए ने कहा।
भेड़िए ने कानों से पूछा- ‘‘अरे कानों। इस गुफा तक पहुँचाने में तुमने मेरी क्या मदद की ॽ’’
कान बोले- ‘‘हमने कुत्तों की आवाजें सुनीं। कुत्ते कहां से आ रहे हैंॽ यह जाना। हमने बताया किधर जाना चाहिए।’’
भेड़िया खुश होत हुए बोला- ‘‘तुमने बहुत शानदार काम किया है।’’
फिर भेड़िए ने आँखों से पूछा- ‘‘तुमने क्या किया मेरी आँखोंॽ’’
आँखें बोली- ‘‘हमने ही तुम्हें रास्ता दिखाया। गुफा दिखाई। तुम्हारी रक्षा की।’’
भेड़िए ने आँखों की तारीफ की। भेड़िया सबकी बातें सुनकर खुश हुआ। जोर-जोर से चिल्लाने लगा- ‘मैं कितना भाग्यशाली हूँ। जिसे इतने अच्छे पैर मिले। इतने चतुर कान और इतनी समझदार आँखें मिली।’
वह अपनी पीठ पर शाबाशी देने को मुड़ा। तभी उसकी नजर अपनी दुम पर पड़ी।
‘‘ओह ! मेरी नन्हीं दुम, तुम भी हो। तुम बताओ दुम रानी, तुमने क्या कियाॽ तुमने कुछ नहीं किया। तुम बस मेरे पीछे चिपकी रही होगी। मुझे तुम्हारा बोझ उठाकर भागना पड़ा। पक्का कह सकता हूँ कि तुम पीछे रहकर मुझे पकड़वा देती। बताओ तो सही तुमने क्या कियाॽ’’
भेड़िये के वचन सुनकर दुम को गुस्सा आया। वह गुस्से में बोली- ‘‘बताऊँ, मैंने क्या कियाॽ मैंने कुत्तों से कहा, आकर मुझे पकड़ लें।’’
भेड़िया आग-बबूला हो गया- ‘‘तुमने ऐसा किया। ठहरो, अभी बताता हूँ। तुरन्त यहां से दफा हो जाओ। तुम मेरे साथ नहीं रह सकती। निकल जाओ इस गुफा से।’’
इतना कहकर भेड़िया गुफा के द्वार पर आ गया। दरवाजे की तरफ पीठ करके उसने दुम को बाहर कर दिया। बाहर खड़े कुत्ते इसी ताक में थे। उन्होंने झट भेड़िये की दुम को पकड़ लिया। सभी कुत्तों ने जोर लगाकर भेड़िये को बाहर खींच लिया और धर दबोचा।